November 13, 2010

तितलियाँ



रोज़ यही होता है
मैं समय की गांठें खोलूं
तो यादों की नाज़ुक
तितलियाँ उड़ने लगती हैं
नीली पीली लाल गुलाबी
रंग बिरंगी यादें
और यादों के पंखों पर
सवार हो कर मैं
रोज़ मिलने जाती हूँ
गुज़रे हुए हर लम्हे से ........
- शेफाली

10 comments:

  1. लिखते रहिये ... शुभकामनाएँ

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  2. kitna samay hai aapke paas
    ki roz yaddon se milne chali jaati hai...

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  3. yaadon se milne ke liye samay ki ni, titliyon ke pankhon ki jarurat hoti hai

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  4. awesummmm........feelingggggg!!!!!!!!

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  5. मैं समय की गांठें खोलूं
    तो यादों की नाज़ुक
    तितलियाँ उड़ने लगती हैं

    शेफाली जी बहुत कोमल है आपकी कविता एकदम तितलियों की तरह !
    शुभकामनायें आपको !

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  6. अच्छी रचना...
    सादर बधाई....

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आपके अनमोल वक़्त के लिए धन्यवाद्
आशा है की आप यूँ ही आपना कीमती वक़्त देते रहेंगे