August 14, 2009


काश मुझे दो पंख होते
माँ मैं भी उड़ जाती,
दूर देश से दाना लेकर
साँझ ढले घर आती,
रोशन होती साँझ हमारी
आँगन में जलती बाती,
तेरे चूल्हे पर बनती
माँ और दो गरम चपाती,

माँ अगर ऐसा होता तो
कितना अच्छा होता,
अम्मा काश आँखों का
हर सपना सच्चा होता,
और जो नहीं ये हो सकता
तो बस इतना हो जाता,
मैं तेरे आँगन में
एक बेटा बन कर आती,
काश मुझे दो पंख होते
माँ मैं भी उड़ जाती



16 comments:

  1. quite similar to a flop movie of Rani Mukherjee's song. or is it the same.
    cool...

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  2. accha hai....bahut accha hai......

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  3. Hmm, Kalpana to achchhi hai but you still have a little pinch of being a girl !! Not fair !! You know, you are special !
    In childhood you would have learned this poem by Ayodhya singh upadhyay "Hariaudh" : Ek boond (http://www.geeta-kavita.com/hindi_sahitya.asp?id=373)

    so, dear, What you are, is special itself !

    And yes, Nice poem !

    Niraj

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  4. achchhi rachna hai.. dil chhuu leti hai aisi rachnaye..

    per I tnink thodi si aur jarurat hai kahina kahi feeling ki

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  5. manoranjan ji
    dhanyawad, koshish kar rahi hun kamiyan dur karne ki

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  6. nice one yaar... tujhe to main pehle se hi guru maan chuka hoon. :)

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  7. कल 15/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. वाह ...बहुत ही अच्‍छी रचना ।

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  9. बहुत प्यारी रचना....
    सादर बधाई...

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  10. बहुत सुन्दर विचारो को संजोया है।

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  11. यशवंत जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया मेरी रचना को मंच प्रदान करने के लिए

    प्यार और स्नेह के लिए सबका धन्यवाद

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आपके अनमोल वक़्त के लिए धन्यवाद्
आशा है की आप यूँ ही आपना कीमती वक़्त देते रहेंगे