अल्हड मस्त बेटियाँ
पायल की खनक बेटियां
बेटियाँ जो आँगन में
चिड़ियों सी फुदकती थीं
बेटियां जो सावन में
झूलों पे चहकती थीं
जी हाँ वही बेटियाँ
जिनका बचपन गुज़र चूका है
अब आँगन में झूले नहीं पड़ते
चाँदी की पायल के
घुँघरू नहीं बजते
सुना है वो बेटियाँ
अब बड़ी हो गयीं हैं।
शब्दों से खेलना बचपन में सीखाया जाता है मैंने भी सीखा, पहले अक्षरों से शब्द बनाना, फिर शब्दों से वाक्य बनाना, पर एक चीज़ जो और सीखी वो था शब्दों को एक सार में पिरोना, मैंने तो कुछ खास नहीं किया पर लोग कहते हैं की मेरे द्वारा पिरोये गए शब्द कविताओं की श्रंखला बन जाते हैं और आज मेरे इन्ही शब्दों से मेरी पहचान है
June 23, 2016
बेटियाँ
July 04, 2014
June 26, 2014
रिश्तों की चटकती कड़ियाँ
संभालोगे ना तो बिखर जाएँगी
रेट की तरह हाथों से फिसल जाएंगी
सातों आसमान सा विशाल लगता है
रिश्तों का हर मंज़र सवाल लगता है
ज़िन्दगी के आँचल तले
पलते रहेंगे ये
हमारे बनाये साँचें में
ढलते रहेंगे ये
सारे सवालों के जवाब ढूँढना
कानों में गूंजती आवाज़ ढूँढना
एक साथी की तलाश हो गर तो
मुझे तुम अपने आस पास ढूँढना
November 28, 2011
बाबुल
September 23, 2011
कैसी रचनाएँ

तुम कवितायें कैसे लिखते हो
कहाँ से तोड़ लाते हो
ये कलियों से महकते शब्द
कौन कुँए से भर लाते हो
एहसास की गगरी
और पूरी गागर उड़ेल कर
भर देते हो रचनाओं में रस
मुझको वो बगिया दिखा दो
उस कुँए से पहचान करा दो
मैं भी हवा में उड़ना चाहती हूँ
पहाड़ नदी झरनों से
बातें करना चाहती हूँ
मैं भी तुम्हारी ही तरह
रिश्ते गढ़ना चाहती हूँ
September 07, 2011
अधूरे सपने
September 04, 2011
मुखौटा
August 06, 2011
यादों की थकान
July 31, 2011
बेड़ियाँ

अंतर्मन के किसी कोने में
एक आत्मा उर भी है
जो आकाश की असीमित
उचाईयों को छूना चाहती है
जो पंख लगा कर उड़ने को व्याकुल है
प्यार की गहराईयों में उतर कर
पवित्रता के मोती चुनना चाहती है
जो जीवन की गंगा संग
मंत्रमुग्ध हो बहना चाहती है
फिर क्यूँ नहीं उसे उड़ने दिया जाता
क्यों नहीं प्यार की गंगा में बहने दिया जाता
क्यूंकि शायद यही दुनिया की रस्मे हैं
हर आत्मा को बेड़ियों में जकड दिया जाता है
और तब तक तद्पाया जाता है
जब तक अरमानो की वो आत्मा
दम तोड़ नहीं देती
........
July 21, 2011
जानता हूँ
July 19, 2011

मेरे एक दोस्त ने मुझे आज कहा "शेफाली जी 'तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी,
हैरान हूँ मैं......' इन पंक्तियों को अपने अंदाज़ में पूरा कीजिये"
तो जो लिखा वो आप सब के साथ बाँट रही हूँ
तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी,
हैरान हूँ मैं
तेरी हर जिद्द पे आज
नीलाम हूँ मैं,
तू जो चाहे वही सफ़र हो मेरा
तेरी ही मंजिल के निशान हूँ मैं..............
हैरान हूँ मैं......' इन पंक्तियों को अपने अंदाज़ में पूरा कीजिये"
तो जो लिखा वो आप सब के साथ बाँट रही हूँ
तुझसे नाराज़ नहीं जिंदगी,
हैरान हूँ मैं
तेरी हर जिद्द पे आज
नीलाम हूँ मैं,
तू जो चाहे वही सफ़र हो मेरा
तेरी ही मंजिल के निशान हूँ मैं..............
July 13, 2011
July 04, 2011
सुबह का अखबार

रात की बारिश के बाद
आज सुबह बहुत सुहानी थी
रोज़ की तरह चाय के साथ
अखबार उठाया
कुछ फ़िल्मी गोस्सिप पढ़ी
बाज़ार की खबरें देखीं
खेल समाचार पढ़े
फिर बाकी अखबार पे
एक सरसरी सी निगाह डाल
उठ गए
रोज़मर्रा के कामों के लिए
कभी कभी लगता है
हम कांच के एक कमरे में
कैद हैं
यहाँ से दीखता सब कुछ है
बस नहीं सुनाई पड़ते
धमाके, चीखें और सिसकियाँ................
May 20, 2011
मेरा जहाँ

मैं जानती हूँ तुम्हारी नज़रों में
मेरी कोई पहचान नहीं
तुम्हारी दौड़ती भागती ज़िन्दगी में
मेरी चाल बहुत धीमी है
मैं जानती हूँ शायद कभी भी
तुम्हारे साथ नहीं चल पाऊँगी
मैं तुम्हारे लिए एक ज़र्रा
एक कतरे से ज्यादा कुछ भी नहीं
पर आ के देखो
यहाँ मेरा अपना आसमान है
एक टुकड़ा ज़मीन मेरी है
यहाँ के पेड पौधे मुझे पहचानते हैं
यहाँ अब भी बारिश होती है
यहाँ के फूलों में खुशबू अब भी बाकी है
यहाँ सूरज भी मेरा सानी है
हाँ तुम्हारी दुनिया से
बस एक कदम दूर
मेरा अपना एक जहाँ है.............
मेरी कोई पहचान नहीं
तुम्हारी दौड़ती भागती ज़िन्दगी में
मेरी चाल बहुत धीमी है
मैं जानती हूँ शायद कभी भी
तुम्हारे साथ नहीं चल पाऊँगी
मैं तुम्हारे लिए एक ज़र्रा
एक कतरे से ज्यादा कुछ भी नहीं
पर आ के देखो
यहाँ मेरा अपना आसमान है
एक टुकड़ा ज़मीन मेरी है
यहाँ के पेड पौधे मुझे पहचानते हैं
यहाँ अब भी बारिश होती है
यहाँ के फूलों में खुशबू अब भी बाकी है
यहाँ सूरज भी मेरा सानी है
हाँ तुम्हारी दुनिया से
बस एक कदम दूर
मेरा अपना एक जहाँ है.............
May 12, 2011
रिश्ता

एक सुन्दर चिकनी माटी सा रिश्ता
विश्वास के चकले पर जब सजाया जाता है
पल पल कुम्हार संस्कार के पानी संग
उसे एक सचल आकार देता है
कुछ रिश्ते टूटते भी हैं
कुछ यूँ ही चटक जाते हैं
कुछ अकार ही नहीं ले पाते
और माटी में ही विलीन हो जाते हैं,
बस कुछ ही विरले होते हैं
जो वक़्त की आग में पकते हैं
मज़बूत हो जाते हैं
और आने वाले हर पल को
सुवासित करते हैं
- शेफाली
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